देहरादून : पिछले दिनों कर्णप्रयाग और नागरासू क्षेत्र में जो घटनाएँ हुईं, वे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक हैं। ये घटनाएँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार कमजोर हो रही है तथा राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में विफल साबित हुई है। बीते कुछ वर्षों में उत्तराखंड में सांप्रदायिक तनाव और विवादों की घटनाएँ बढ़ी हैं, जिन पर अंकुश लगाने में सरकार की असफलता लगातार सामने आ रही है।

कर्णप्रयाग में स्थानीय युवकों के साथ हुई एक सामान्य कहासुनी के बाद जिस प्रकार कुछ निहंग सिखों द्वारा तलवारों से हमला कर युवकों को घायल किया गया, वह अत्यंत गंभीर मामला है। इसके बाद नागरासू गुरुद्वारे में कुछ निहंगों द्वारा हथियारों के बल पर कब्जा करने, तोड़-फोड़ करने, स्थानीय सेवादारों को परेशान करने तथा कई दिनों तक उपद्रव मचाने की घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है ।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि राज्य सरकार ने इस पूरे मामले में कठोर कार्रवाई करने के बजाय पंजाब से आए प्रभावशाली नेताओं के दबाव में झुकते हुए कथित रूप से उपद्रव करने वाले निहंगों को जाने दिया, जबकि स्थानीय युवकों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर दी गई और मामले को चमोली एवं रुद्रप्रयाग से हटाकर हरिद्वार स्थानांतरित कर दिया गया। इससे यह संदेश जाता है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के नागरिकों के हितों और न्याय की भावना से अधिक राजनीतिक समीकरणों को महत्व दिया है।

हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि उत्तराखंड में सिख समुदाय का सदैव सम्मान रहा है। सिख समाज का उत्तराखंड के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सैकड़ों वर्षों से सिख समुदाय यहाँ निवास करता आया है और उत्तराखंड तथा सिख समाज के बीच आत्मीय एवं भाईचारे के संबंध रहे हैं। हमारा विरोध किसी धर्म या समुदाय से नहीं है, बल्कि उन तत्वों से है जो कानून अपने हाथ में लेकर शांति व्यवस्था को भंग करते हैं।

हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पंजाब और अन्य राज्यों से पवित्र हेमकुंड साहिब की यात्रा के लिए उत्तराखंड आते हैं। अधिकांश यात्री पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा करते हैं, किंतु समय-समय पर कुछ अति कट्टर और उग्र प्रवृत्ति के निहंग हथियारों के साथ पहुँचकर विवाद और तनाव पैदा करते रहे हैं। यह गंभीर प्रश्न है कि तलवारों, भालों और अन्य धारदार हथियारों से लैस निहंगों को बिना पर्याप्त जांच और निगरानी के यात्रा कैसे करने दिया जाता है।

यदि कर्णप्रयाग में तलवार के हमले से किसी युवक की मृत्यु हो जाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या राज्य सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा नहीं होंगी? जिस युवक पर तलवार से हमला हुआ और जो घायल हुआ, उसके बजाय स्थानीय युवकों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आधार क्या था? जब कथित हमलावरों को कोई गंभीर चोट तक नहीं आई, तब पीड़ित पक्ष को ही आरोपी क्यों बनाया गया?

यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उपद्रव करने वाले निहंगों की चिकित्सीय एवं नशीले पदार्थों की जांच क्यों नहीं कराई गई। यदि वे किसी नशे या अन्य प्रभाव में थे तो इसकी जांच आवश्यक थी। बिना निष्पक्ष जांच पूरी किए उन्हें राज्य से बाहर जाने की अनुमति कैसे दे दी गई? साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मामला स्थानीय पुलिस से लेकर हरिद्वार पुलिस को किस आधार पर स्थानांतरित किया गया।

हम मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एवं उत्तराखंड सरकार से निम्नलिखित मांगें करते हैं—

1. स्थानीय युवकों के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी(FIR) को तत्काल निरस्त किया जाए तथा निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

2. तलवारों से हमला करने, गुरुद्वारे में तोड़-फोड़ और उपद्रव फैलाने वाले निहंगों के विरुद्ध नामजद प्राथमिकी दर्ज कर कठोर कानूनी धाराओं में कार्रवाई की जाए तथा आवश्यक होने पर उत्तराखंड पुलिस पंजाब जाकर उनकी गिरफ्तारी करे।

3. उत्तराखंड में यात्रा के दौरान निहंगों द्वारा तलवार, भाले और अन्य खतरनाक हथियारों के उपयोग एवं प्रदर्शन के संबंध में स्पष्ट नियम बनाए जाएँ और रोक लगाई जाए । यदि धार्मिक परंपराओं के कारण कुछ विशेष छूट आवश्यक हो, तो ऐसे हथियारबंद निहंगों की यात्रा पुलिस निगरानी में कराई जाए तथा उनके ठहरने और पार्किंग की पृथक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

4. कर्णप्रयाग एवं रुद्रप्रयाग में हुई घटनाओं की जांच हरिद्वार पुलिस से वापस लेकर संबंधित जिलों चमोली और रुद्रप्रयाग की पुलिस और प्रशासन को सौंपी जाए तथा पूरी घटना की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराई जाए।

5. उत्तराखंड के गुरुद्वारों के संचालन और प्रबंधन में उत्तराखंड के स्थानीय सिख समुदाय की भूमिका को प्राथमिकता दी जाए, ताकि धार्मिक संस्थाएँ बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और राजनीतिक उद्देश्यों का माध्यम न बनें।

यदि राज्य सरकार हमारी इन न्यायोचित मांगों की उपेक्षा करती है, तो हम लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक जनआंदोलन और चक्का जाम जैसे कार्यक्रमों पर विचार करने के लिए बाध्य होंगे।

हम पुनः स्पष्ट करना चाहते हैं कि उत्तराखंड शांति, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की भूमि है। यहाँ सभी धर्मों और समुदायों का सम्मान किया जाता है तथा भविष्य में भी किया जाता रहेगा। किंतु किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक उग्रवाद, हिंसा या कानून को चुनौती देने वाली गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री धामी और राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्तराखंड के मामलों में बाहरी राजनीतिक दबाव और हस्तक्षेप न हो तथा राज्य की जनता के न्याय, सम्मान और सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता न किया जाए। उत्तराखंड को किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति का अखाड़ा बनने से बचाना सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है।

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