कर्णप्रयाग। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर सामने आई है। आदिबदरी क्षेत्र के पंडाव गांव में प्रसव पीड़ा से परेशान एक गर्भवती महिला को भारी बारिश के बीच ग्रामीणों ने करीब छह किलोमीटर तक कुर्सी के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद 108 एंबुलेंस की मदद से महिला को उपजिला चिकित्सालय कर्णप्रयाग पहुंचाया गया, जहां उसने सुरक्षित रूप से एक बालिका को जन्म दिया।
प्रसव पीड़ा के बाद बढ़ी परेशानी
पंडाव गांव निवासी 24 वर्षीय मुन्नी देवी को शनिवार दोपहर अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। क्षेत्र में पिछले दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। प्रसव पीड़ा की सूचना मिलने के बाद आशा कार्यकर्ता अल्का नेगी और परिजनों ने महिला को अस्पताल पहुंचाने की तैयारी शुरू की।
ग्रामीण महिला को लेकर मुख्य सड़क की ओर पैदल निकले, लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद प्रसव पीड़ा बढ़ने के कारण वह चलने में असमर्थ हो गई।
कुर्सी को बनाया सहारा, छह किमी तक पहुंचाया
महिला की स्थिति को देखते हुए ग्रामीणों ने कुर्सी को डंडियों के सहारे उठाने की व्यवस्था की। इसके बाद बारिश के बीच ग्रामीण करीब छह किलोमीटर का जोखिम भरा सफर तय कर गर्भवती महिला को मुख्य सड़क तक लेकर पहुंचे।
मुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद 108 एंबुलेंस की मदद से महिला को रात करीब नौ बजे उपजिला चिकित्सालय कर्णप्रयाग पहुंचाया गया।
अस्पताल में सुरक्षित हुआ प्रसव
अस्पताल पहुंचने के बाद चिकित्सकों ने महिला का उपचार शुरू किया। करीब रात 9:30 बजे चिकित्सकों की देखरेख में मुन्नी देवी का सुरक्षित प्रसव कराया गया। महिला ने एक बालिका को जन्म दिया। जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित बताए गए हैं।
सड़क सुविधा नहीं होने से हर बार उठाना पड़ता है जोखिम
आशा कार्यकर्ता अल्का नेगी ने बताया कि पंडाव गांव में सड़क सुविधा नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने में काफी परेशानी होती है। आपात स्थिति में ग्रामीणों को डंडी-कंडी या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है।
बारिश के दौरान यह परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे में ग्रामीणों ने एक बार फिर सड़क सुविधा की जरूरत को सामने रखा है, ताकि प्रसव जैसी आपात स्थिति में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सके।
यह घटना पहाड़ के उन गांवों की जमीनी तस्वीर दिखाती है, जहां आज भी सड़क सुविधा के अभाव में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर तक जोखिम उठाना पड़ता है।







